व्यष्टि अर्थशास्त्र: 2. उपभोक्ता व्यवहार और मांग (Part-2)

उपभोक्ता व्यवहार और मांग (Part-2) - विस्तृत शैक्षणिक नोट्स
Read in Hindi / हिंदी में पढ़ें:

उपभोक्ता व्यवहार और मांग (Part-2): बाजार विश्लेषण

व्यष्टि अर्थशास्त्र: 2. उपभोक्ता व्यवहार और मांग (Part-2)

व्यष्टि अर्थशास्त्र में 'मांग' केवल एक इच्छा नहीं है, बल्कि यह बाजार की वह शक्ति है जो वस्तुओं के मूल्य और उत्पादन की दिशा निर्धारित करती है। एक उपभोक्ता के रूप में हमारी पसंद, आय और बाजार की कीमतें मिलकर एक जटिल तंत्र का निर्माण करती हैं। पिछले भाग में हमने 'उपयोगिता' और 'उपभोक्ता संतुलन' को समझा। इस भाग में हम मांग की गहराईयों में उतरेंगे—मांग क्या है, इसे कौन से कारक प्रभावित करते हैं, मांग का नियम क्या कहता है और सबसे महत्वपूर्ण, मांग की लोच (Elasticity) कैसे काम करती है। यह विश्लेषण एक विद्यार्थी के लिए आर्थिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को समझने हेतु अनिवार्य है।


2.3 मांग का अर्थ: इच्छा बनाम वास्तविकता

साधारण बोलचाल में हम इच्छा, आवश्यकता और मांग को एक ही मान लेते हैं, लेकिन अर्थशास्त्र में इनमें बड़ा अंतर है। मांग होने के लिए तीन शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है: 1. वस्तु प्राप्त करने की इच्छा, 2. खरीदने के लिए पर्याप्त साधन (धन), और 3. उस धन को खर्च करने की तत्परता।

📌 मांग की परिभाषा:
किसी वस्तु की माँग का तात्पर्य वस्तु की उस मात्रा से है, जिसे उपभोक्ता एक निश्चित कीमत पर, एक निश्चित समय अवधि में खरीदने के लिए तैयार और सक्षम होता है। यदि किसी के पास पैसा है लेकिन वह खर्च नहीं करना चाहता, या कोई खरीदना चाहता है लेकिन पैसा नहीं है, तो उसे 'मांग' नहीं माना जाएगा।

माँग के प्रकार: व्यक्तिगत बनाम बाजार माँग

  • व्यक्तिगत माँग: यह किसी एक विशिष्ट उपभोक्ता द्वारा एक निश्चित कीमत पर माँगी गई मात्रा को दर्शाती है।
  • बाजार माँग: यह एक निश्चित कीमत पर बाजार में मौजूद सभी उपभोक्ताओं द्वारा माँगी गई मात्राओं का कुल योग है। बाजार मांग व्यक्तिगत मांग वक्रों का क्षैतिज जोड़ (Horizontal Summation) होती है।

वस्तु की मांग को प्रभावित करने वाले निर्धारक तत्व

मांग स्थिर नहीं रहती; यह कई आंतरिक और बाहरी कारकों पर निर्भर करती है। इन्हें 'मांग के निर्धारक' (Determinants of Demand) कहा जाता है।

1. वस्तु की अपनी कीमत (Price of the Good)

यह सबसे प्रभावशाली कारक है। सामान्यतः कीमत बढ़ने पर मांग कम होती है और कीमत घटने पर मांग बढ़ती है।

2. संबंधित वस्तुओं की कीमतें (Price of Related Goods)

संबंधित वस्तुएं दो प्रकार की होती हैं:

  • स्थानापन्न वस्तुएं (Substitutes): जैसे चाय और कॉफी। यदि कॉफी की कीमत बढ़ेगी, तो लोग चाय की ओर मुड़ेंगे, जिससे चाय की मांग बढ़ जाएगी। यहाँ 'सीधा संबंध' होता है।
  • पूरक वस्तुएं (Complements): जैसे पेन और स्याही या कार और पेट्रोल। यदि पेट्रोल की कीमतें बढ़ती हैं, तो कार की मांग कम हो जाएगी क्योंकि दोनों का साथ चलना महंगा पड़ेगा। यहाँ 'विपरीत संबंध' होता है।

3. उपभोक्ता की आय (Income of the Consumer)

आय का प्रभाव वस्तु की प्रकृति पर निर्भर करता है:

  • सामान्य वस्तुएं: आय बढ़ने पर इनकी मांग बढ़ती है (जैसे ब्रांडेड कपड़े, शुद्ध दूध)।
  • निम्न कोटि (Inferior) वस्तुएं: आय बढ़ने पर उपभोक्ता इन वस्तुओं को छोड़कर अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तुओं पर चला जाता है, जिससे इनकी मांग घट जाती है (जैसे मोटा अनाज, टोंड दूध)।

4. अभिरुचि, फैशन और वरीयताएं

उपभोक्ता अक्सर वही चीजें खरीदते हैं जो चलन या फैशन में होती हैं। यदि किसी वस्तु का फैशन चला जाए, तो कीमत कम होने पर भी उसकी मांग नहीं बढ़ती।


माँग का नियम (Law of Demand)

मांग का नियम कीमत और मांग की मात्रा के बीच के विपरीत संबंध को स्पष्ट करता है।

✅ नियम का कथन: "अन्य बातें समान रहने पर" (Ceteris Paribus), जब किसी वस्तु की कीमत घटती है तो उसकी माँगी गई मात्रा बढ़ती है, और जब कीमत बढ़ती है तो माँगी गई मात्रा घटती है।

नियम की मान्यताएँ:

  1. उपभोक्ता की आय स्थिर रहनी चाहिए।
  2. संबंधित वस्तुओं (स्थानापन्न और पूरक) की कीमतें नहीं बदलनी चाहिए।
  3. उपभोक्ता की पसंद और फैशन में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए।

माँग के नियम के अपवाद (Exceptions)

कुछ विशेष परिस्थितियों में कीमत बढ़ने पर भी मांग बढ़ जाती है, जो मांग के नियम का उल्लंघन है:

  • गिफेन वस्तुएं (Giffen Goods): अत्यंत निम्न श्रेणी की वस्तुएं जिन पर गरीब अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करता है।
  • वैब्लेन या विलासिता की वस्तुएं: ऐसी वस्तुएं जो सामाजिक प्रतिष्ठा (Status Symbol) का प्रतीक हैं, जैसे हीरे या विंटेज कारें। इनकी मांग कीमत बढ़ने पर बढ़ती है क्योंकि वे अधिक 'विशिष्ट' हो जाती हैं।
  • भविष्य की आशंका: यदि युद्ध या अकाल की स्थिति लगे, तो उपभोक्ता भविष्य में कमी के डर से वर्तमान में ऊँची कीमतों पर भी स्टॉक जमा कर लेता है।

मांग वक्र पर संचलन बनाम खिसकाव

विद्यार्थियों के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि मांग में परिवर्तन दो प्रकार से होता है:

1. मांग वक्र पर संचलन (Change in Quantity Demanded):

यह केवल वस्तु की अपनी कीमत में परिवर्तन के कारण होता है।

  • मांग का विस्तार: कीमत घटने पर मांग का बढ़ना (नीचे की ओर संचलन)।
  • मांग का संकुचन: कीमत बढ़ने पर मांग का घटना (ऊपर की ओर संचलन)।

2. मांग वक्र में खिसकाव (Change in Demand):

यह कीमत के अलावा अन्य कारकों (आय, फैशन आदि) के कारण होता है।

  • मांग में वृद्धि: समान कीमत पर अधिक मांग (वक्र दायीं ओर खिसक जाता है)।
  • मांग में कमी: समान कीमत पर कम मांग (वक्र बायीं ओर खिसक जाता है)।

2.4 मांग की लोच (Elasticity of Demand)

मांग का नियम केवल 'दिशा' बताता है (कीमत बढ़ी तो मांग घटेगी), लेकिन मांग की लोच यह बताती है कि मांग कितनी बदलेगी। यह परिवर्तन की मात्रा को मापता है।

मांग की लोच के तीन आयाम:

  1. कीमत लोच: कीमत में बदलाव के प्रति संवेदनशीलता।
  2. आय लोच: आय में बदलाव के प्रति संवेदनशीलता।
  3. तिरछी (Cross) लोच: संबंधित वस्तु की कीमत में बदलाव के प्रति संवेदनशीलता।

मांग की कीमत लोच की श्रेणियाँ (Degrees)

श्रेणी मान (ed) विशेषता और उदाहरण
पूर्णतः बेलोचदार 0 कीमत कितनी भी बदले, मांग स्थिर (जैसे—जीवन रक्षक दवा)।
इकाई से कम (बेलोचदार) < 1 मांग में परिवर्तन कीमत से कम होता है (जैसे—नमक, अनाज)।
इकाई लोचदार 1 जितना प्रतिशत बदलाव कीमत में, उतना ही मांग में।
इकाई से अधिक (लोचदार) > 1 मांग में परिवर्तन बहुत अधिक होता है (जैसे—TV, AC, विलासिता)।
पूर्णतः लोचदार कीमत में नाममात्र बदलाव मांग को अनंत तक बढ़ा या घटा देता है।

मांग की लोच को मापने की विधियाँ

I. प्रतिशत परिवर्तन विधि:

ed = मांग में % परिवर्तन / कीमत में % परिवर्तन

II. ज्यामितीय या बिंदु विधि (Geometric Method):

जब मांग वक्र एक सीधी रेखा हो, तो किसी बिंदु पर लोच इस प्रकार मापी जाती है:

ed = निचले खंड की लंबाई / ऊपरी खंड की लंबाई

कुल व्यय विधि और मांग की लोच (मार्शल का दृष्टिकोण)

कीमत में बदलाव का कुल खर्च (Price × Quantity) पर क्या प्रभाव पड़ता है, इससे भी लोच का पता चलता है:

  • लोचदार मांग (>1): यदि कीमत गिरने पर कुल व्यय बढ़ जाए (विपरीत संबंध)।
  • बेलोचदार मांग (<1): यदि कीमत गिरने पर कुल व्यय भी घट जाए (सीधा संबंध)।
  • इकाई लोचदार (=1): यदि कीमत के बदलने पर भी कुल व्यय स्थिर रहे।

मांग की लोच को प्रभावित करने वाले कारक

क्यों कुछ वस्तुओं की मांग तुरंत बदल जाती है और कुछ की नहीं?

  • स्थानापन्न वस्तुओं की उपलब्धता: यदि विकल्प अधिक हैं (जैसे पेप्सी और कोक), तो मांग अधिक लोचदार होगी।
  • वस्तु की प्रकृति: अनिवार्य वस्तुओं की मांग बेलोचदार होती है, जबकि विलासिता की वस्तुओं की मांग लोचदार।
  • उपभोग का स्थगन: जिस वस्तु का उपभोग टाला जा सकता है (जैसे—नया घर), उसकी मांग लोचदार होती है।
  • आय का स्तर: उच्च आय वर्ग के लोगों के लिए मांग अक्सर बेलोचदार होती है क्योंकि कीमतों का उन पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।
  • आदतें: व्यसन या आदत वाली वस्तुओं (जैसे—तंबाकू) की मांग हमेशा बेलोचदार होती है।

निष्कर्ष: आर्थिक विश्लेषण का महत्व

मांग और उसकी लोच का अध्ययन केवल किताबी ज्ञान नहीं है। यह व्यापारियों के लिए उनकी मूल्य नीति (Pricing Policy) तय करने, सरकार के लिए कर (Tax) लगाने और वित्त मंत्री के लिए बजट बनाने का आधार है। जो वस्तुएं बेलोचदार होती हैं, सरकार अक्सर उन्हीं पर ऊँचे कर लगाती है क्योंकि लोग उन्हें खरीदना बंद नहीं कर सकते। अंततः, बाजार की अदृश्य शक्तियां मांग और आपूर्ति के इसी संतुलन पर टिकी हैं।

💡 सारांश: मांग का नियम हमें आर्थिक व्यवहार की दिशा दिखाता है, जबकि मांग की लोच हमें उस व्यवहार की तीव्रता बताती है। इन दोनों का समन्वय ही एक उपभोक्ता को बाजार का 'सचेत रणनीतिकार' बनाता है।